कवि स्वाभावतः अति संवेदनशील होते हैं और कवियित्री उनसे
भी अधिक। दिव्या माथुर ने संवेदना की हद को स्पर्श किया है और अपने सातों काव्य
संकलनों - 'अन्तःसलिला'; 'चन्दन पानी'; '११-सितम्बर: सपनों की राख़ तले'; 'ख़याल
तेरा'; 'रेत का लिखा' 'झूठ, झूठ और झूठ'; हा जीवन! हा मृत्यु!', में सुगंध और प्यास की चाहत एवं अहसास को
शब्दों के नक्काशीदार कटोरे से कागज़ पर जगह जगह उड़ेलने का साहस दिखाया है। इसी
कोशिश में उन्होंने अपने इस संग्रह में दोनों के बीच का लगाव-अलगाव अपनी अनुभूतियों अनुभवों दृष्टि से पकड़ने
जानने का प्रयास किया है। परिणामस्वरूप उनकी भिन्न अनुभूतियाँ उनके भिन्न अनुभव
एवं उनकी भिन्न दृष्टि अलग अलग काव्य रूपों के सौंदर्य का स्वमेव आकार गृहण करती
नज़र आती हैं।
दिव्या माथुर की रचनाधर्मिता की क्षमता को आत्मीयता से मैंने तब जाना जब
मैं लंदन स्थित नेहरु सेंटर में प्रवास कर रहा था और वह मेरे साथ कार्यरत थीं।
वहाँ मैंने अनेक प्रवासियों के अंदर अपनी
संस्कृति को जीने की ललक तथा उसे बटोरने की उत्कट आकांक्षा देखी। कवयित्री दिव्या
भी अपनी संस्कृति को सहेजने में अनवरत रूप से जुटी हैं और इस क्रम में
लोगों को लोगों से भारत को भारतीयता
से और सभी को संस्कृति से अलग अलग उपक्रमों द्वारा जोड़ रहीं हैं। इस शैली
में वह अधिकारी से अधिक समर्पित संस्कृतिकर्मी नज़र आती हैं। उनका सृजन संस्कृति को
सहेजने का एक खूबसूरत माध्यम है और उनके सातों कविता-संग्रह, पांचो कहानी संग्रह
और हाल ही में रचित पहला उपन्यास, उसी का सार्थक प्रतिफल है।
जीवन और मृत्यु पर आधारित रचनाओं के इस संग्रह में कोई ऐसा रंग नहीं
है जिसे दिव्या पकड़ने में सफल न रही हो। जहां एक ओर दिव्या ने ‘सब में मैं उसकी छब
देखूँ हँसते लोग लुगाई जी, याद आये वो यूँ जैसे दुखती पाँव बिवाई जी’ और ‘काली बदरिया आई घिर इक हूक उठी ओ माई फिर’ जैसे गीत लिखे हैं वहीं ‘कैसे कह दें कि वो पराया है उसके ख्वाबों में हम सँवरते हैं हमारे दरमियाँ हूँ
मैं भी नहीं हो कहीं और कोई डरते हैं’ अथवा ‘ग़ुंचों की तबाही का
क्या कीजे आँधी की गवाही का क्या कीजे’ अथवा ‘कुछ आग और लगानी होगी चंद लपटें ये
जलायेंगी नहीं’ जैसी सशक्त गज़लों
की भी रचना की है। वास्तव में उनके मिज़ाज़ के इंद्रधनुष में सात से भी अधिक रंग है वह कैफ़ियत देती ही नहीं, बल्कि लेती भी
हैं - ‘क्यूँ बँधी हूँ मैं
तुझसे अब तक, जब छोड़ के तू घर बार गया, मेरे हिस्से कर्तव्य ही हैं, क्या हैं मेरे
अधिकार बता’ अथवा ‘कल संपूर्ण
तुम्हारा था, संपूर्ण ही कल तुम मुझको दोगे’। उनकी तुनकमिज़ाज़ी के तो कई क़िस्से मिल जाएंगे ‘खुदा जब बुलाएगा सोचूंगा तब ही, मैं
जल्दी में उठने का क़ायल नहीं हूं’ अथवा ‘तुम्हें हम याद अब
नहीं करते, वक्त बरबाद अब नहीं करते’।
दिव्या के कुछ बिंब देखिए- ‘नदी किनारे बैठ कोई पानी में फेंके ज्यूँ ढेले, ख़याल
तेरे मन में मेरे, बना रहे हैं यूँ घेरे’ अथवा ‘पानी के बुलबुले सी तेरे हाथों से फिसल जाऊँगी, चंद
लमहों में सुबह के तारों सी बिखर जाऊँगी’ अथवा ‘एक बेसिर और बेनाम पुरुष, हर रात मेरा पीछा करता
है, अपने सिर के बारे में वह पूछताछ किया करता है।’ ‘नभ की सैर को चली पतंग, माँझे को अपने ले
संग’ अथवा ‘सुबह-सुबह होली
खेला सूरज धरती के संग, भरी धूप से पिचकारी तो धरती रह गई दंग’ आदि आदि रचनाओं में
रचनाकार की दृष्टि की व्यापकता के साथ साथ उसके मर्म के फ़लक का भी अनायास ही पता
चल जाता है।
फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं, फिर वही ज़िंदगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है
पवन कुमार वर्मा
बिहार के मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार
पूर्व निदेशक, नेहरु केंद्र, लन्दन
पूर्व महानिदेशक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, दिल्ली